
जीवन की राहों में बहुत-कुछ
मुझे अनजाने, अनचाहे,
अनायास ही मिल गया।
पर उस मिलने के महत्व को
मैनें समझा ही कहां ?
और समझती भी कैसे?
क्यॊंकि उस ओर मेरा
ध्यान ही कहां था?
मेरा सारा ध्यान तो
उसी ओर केन्द्रित रहा,
जो मैंने बार-बार चाहा
पर मुझे न मिल सका।
पूरी आत्मशक्ति लगाकर
मैंने अपना सारा ध्यान
उसी ओर रखा, जो अभीतक
मुझे नहीं मिल सका था ।
उसी को लेकर स्वयं को
दीन-हीन और दुखी समझा,
तब अपनी उपलब्धियों को
देखने का अवकाश कहां था?
दीनता-हीनता का वह
निराधार भ्रमजाल टूटा,
तो सत्य की किरणों का
प्रकाश सा फ़ूटा ।
सहसा मैं विमूढ सी,
कृतज्ञता से भरी उसके प्रति
सहसा मैं विमूढ सी,
कृतज्ञता से भरी उसके प्रति
जिसकी कृपा से मुझे
वह सब था मिला,
जिसके मिलने का बोध
अबतक मुझे नहीं था।
अब तो मन था शान्त,
उसमें कोई रोष न था ।
बहुत अच्छा लिखा है आपने ।
ReplyDeleteमैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-इन देशभक्त महिलाओं के जज्बे को सलाम- समय हो तो पढें और कमेंट भी दें-
http://www.ashokvichar.blogspot.com
bahut kuchh aisaa hai aapke lekhan me jopaathak k dil-o-dimaag par asarkaari hai............
ReplyDeleteaapki balihaari hai
badhaai !
अच्छा लगा पढ़कर.
ReplyDeleteयही होता है जीवन में। सत्यवचन।
ReplyDeleteसादर
श्यामल सुमन
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