
प्रवासी की पीड़ा
एक प्रश्न बादल सा बोझिल,मन में मेरे घिर-घिर आता,
प्रवास के इस जीवन में.क्या खोया, क्या मैंने पाया ?
त्योहारों पर माता का, प्यार भरा निमंत्रण पाना।
और विभिन्न बहानों से,साजन का अपने पास बुलाना॥
ऐसे मधुर प्रसंगों से, स्वयं को मैंने वंचित पाया
प्रवास के इस जीवन में.क्या खोया, क्या मैंने पाया ?
हास-परिहास देवरों के,नन्दों की मीठी फ़टकार ।
भाई-बहनों के उपालम्भ,जिनसे बरबस था झरता प्यार॥
ऐसी मीठी बातों का अवसर जीवन में कम आया ।
प्रवास के इस जीवन में.क्या खोया, क्या मैंने पाया ?
अपने बच्चों ने सच पूछो,नानी -दादी का प्यार न जाना।
बरसों पर मिले यदि तो, सबने उनको पाहुन ही माना॥
सब संग मिलकर रह पाने से,उनमें जो पड़ते संस्कार।
वे भला पनपते कैसे, उन्हें न मिला ठोस आधार॥
ऐसी-ऐसी कितनी बातें, कहाँ तक गिनाऊँ मैं ?
क्या खोया इस विषय का, ओर-छोर न पाऊँ मै॥
सहसा पत्रों से जब जाना, दूर बसे प्रियजन बीमार।
उनसे मिलने को व्याकुल मन,दूरी बनी विकट दीवार॥
और कभी प्रियजन को खोया चिरनिद्रा में, हो लाचार।
ऐसे अवसर पर प्रवास को मिला,सौ सौ बार धिक्कार॥
मन के घाव समय से भरते,पर ये न कभी भर पायेंगे?
इस खोने की गहराई को, क्या शब्द व्यक्त कर पायेंगे?
यदि जन्म-जन्मान्तर सच है,तो हे प्रभु यह वर देना,
देना जन्म उसी धरती पर, शाप प्रवास का हर लेना ॥
बहुत सटीक रचना प्रवासी पीड़ा पर...उम्दा अभिव्यक्ति!!
ReplyDeleteअपने बच्चों ने सच पूछो,नानी -दादी का प्यार न जाना।
ReplyDeleteबरसों पर मिले यदि तो, सबने उनको पाहुन ही माना॥
सच है अभी बेटी कैलिफोर्निया से आयी थी दो दिन पहलेही गयी है । आँखें नम हो गयी आपकी ये रचना पढ कर । हर पँक्ति लगा जैसे मेरी बेटी के दिल का भी दर्द् है। दिल को छूने वाली इस रचना के लिये आभार और शुभकामनायें
दूर बसे लोगों के दिल में भी अपनों के लिए पीड़ा का भाव आ बसा है यह अच्छा संकेत हैं। वरना इस देश के लोग तो स्वयं ही पीड़ा से बेहाल होते हैं और दूर बसे प्रवासियों को बस आशीष ही देते हैं।
ReplyDeleteप्रवास की वास्तविक वस्तुस्थिति का चित्राकंन सा करती अविस्मरणीय भारतीय परिवेश की सुखद स्मृति दिलाती आपकी ये रचना अपने आप में अनूठी है।कवि सम्मेलन में सुनकर तो सरसता द्विगुणित हो उठी थी।
ReplyDeleteबहुत ही सटीक रचना है आपकी ..प्रवासी की पीड़ा को उकेर कर रख दिया आपने..
ReplyDeleteमेरी एक रचना है ..इसी विषय पर समय मिले तो पढियेगा...
ये रहा लिंक ::
http://swapnamanjusha.blogspot.com/2010/01/blog-post_20.html
बहुत सुन्दर रचना है आशा दी, मार्मिक और सटीक!
ReplyDeleteआशा जी ,
ReplyDelete"यदि जन्म-जन्मान्तर सच है,तो हे प्रभु यह वर देना,
देना जन्म उसी धरती पर, शाप प्रवास का हर लेना ॥"
मेरे विचार से "प्रवास" भाग्यशाली लोगों को ही मिलता है | यह प्रवासी जीवन (बनवास) किसी ने १४ साल
बिताय थे | फिर ऐसी दुआ किस लिए मांग रही हैं आप |
डॉ. ग़ुलाम मुर्तज़ा शरीफ
अमेरिका