हम न भूलें संस्कृति अपनी,
मन्त्र यही दोहराओ ।


धरा सा विस्तीर्ण.
अनल सा दाहक,
अनिल सा वाहक,
सागर सा विस्तार,
तुम्हारा प्यार!
देश में नगर.
नगर का कोई परिवेश,
उसमें, मैं अकिंचन!
अपनी लघुता से विश्वस्त,
तुम्हारी महत्ता से आश्वस्त,
निज सीमाओं में आबद्ध
मैं हूँ प्रसन्नवदन!
परस्पर हम प्रतिश्रुत,
पल - पल बढ़ता प्यार,
शब्दों पर नहीं आश्रित,
भावों को भावों से राह!
तुम्हारी महिमा का आभास,
पाकर मैंने अनायास,
दिया सौंप सारा अपनापन
चिन्तारहित मेरा मन!

जिन जीवनमूल्यों में जीते थे,
उनको फ़िर से रहे आंक।
क्या त्यागें. हम क्या अपनायें?
हम विमूढ़ से रहे ताक ॥
स्वदेश लौट्ने की योजना
सदैव स्थगित करते गये।
साथ ही एक अपराधबोध
मन में विकट भरते रहे॥
ऊपर से सम्पन्न सही,
अन्तर से निपट निर्धन।
हम इतने क्यों निरुपाय?
अपने प्रति यह है अन्याय॥
जब सारी सृष्टि का वह निर्माता,
हर देश का उससे ही नाता।
तो यह कैसा है विरोध?
कैसा यह अपराधबोध?
हम समझें निज को भाग्यवन्त,
दो संस्कृतियों को हमने जाना,
उनके गुण-अवगुण को
निकट से हमने पहचाना॥
हम भारत माता के कृतज्ञ,
जिसने हमें जन्म दिया।
इस विदेशभूमि ने भी
भरण-पोषण व शरण दिया॥
भारत ने सदा से ही
पोषक को सम्मान दिया ।
देवकीनंदन कृष्ण यशोदा का
बेटा भी कहलाया ॥

